देहरादून । सोमवार को वाराणसी के ज्ञान व्यापी मंदिर के संबंध में न्यायालय का निर्णय सामने आया जिसमें न्यायालय ने हिंदुओं के पक्ष में निर्णय घोषित किया। जब से नरेंद्र मोदी की सरकार आई है उसके बाद लगातार न्यायपालिका में बदलाव दिख रहा है।

उसके पहले 70 वर्षों तक न्यायपालिका के द्वारा जो भी निर्णय दिए जाते थे वे मुस्लिम सांप्रदायिकता की ओर साफ-साफ झुके हुए होते थे। लेकिन पिछले 8 वर्षों से यह साफ दिख रहा है कि या तो न्यायपालिका के निर्णय निष्पक्ष हो रहे हैं अथवा हिंदुओं के पक्ष में झुके हुए हैं। सच्चाई जो भी हो लेकिन दिशा बिल्कुल बदली हुई दिख रही है। इसका मुख्य कारण है भारत की राजनीतिक व्यवस्था में बहुत बड़ा बदलाव आया है। नरेंद्र मोदी के पहले तक भारत में मुसलमानों और राजनैतिक सत्ता के बीच एक अघोषित समझौता था उसी समझौते को सांस्कृतिक धरातल पर उतारने के लिए जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी बनाई गई थी।

जेएनयू से निकले हुए प्रशिक्षित लोगों को ही न्यायपालिका से लेकर अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्थानों पर स्थापित किया जा रहा था। स्वाभाविक था कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभों पर मुस्लिम सांप्रदायिकता और नेहरू परिवार की पकड़ मजबूत होती जा रही थी। इसी का प्रभाव साहित्य और कला के क्षेत्र में भी दिखाई दे रहा था। सभी क्षेत्रों में मुस्लिम सांप्रदायिकता को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर स्थापित किया जा रहा था। अब नरेंद्र मोदी के आने के बाद यह एक पक्षीय ताना-बाना टूटता हुआ दिख रहा है।

साहित्य के क्षेत्र में भी बदलाव दिख रहा है। प्रशासनिक स्तर पर तो बदलाव स्वाभाविक था ही लेकिन न्यययिक क्षेत्र में भी जिस तरह का बदलाव दिख रहा है वह एक शुभ संकेत है। अब तक न्यायपालिका आंख बंद करके कानूनों के अनुसार चलती थी और कानून मुस्लिम सांप्रदायिकता के पक्ष में बनाए जाते थे लेकिन अब न्यायपालिका लगातार अपनी सोच में बदलाव कर रही है। मैं यह तो नहीं कह सकता कि वर्तमान समय में न्यायपालिका पूरी तरह निष्पक्ष हो गई है अथवा हिंदुओं की तरफ झुक रही है लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूं कि न्यायपालिका अभी साम्यवादी मुस्लिम सांप्रदायिकता के चंगुल से मुक्त होती जा रही है। यह बदलाव हमारे लिए एक अच्छा संकेत है।